सुलतानपुर। विकासखंड का भंडरा ग्राम एक अद्भुत उदाहरण है यहां का पशु चिकित्सालय अब पशु से ज्यादा चिकित्सालय खुद बीमार है। डॉक्टर साहब और कर्मचारी तो जैसे किसी स्वर्गीय विभाग में कार्यरत हैं। कागजों पर सक्रिय, ज़मीन पर लापता!
कहते हैं इमारतें बोलती हैं पर भंडरा का यह पशु चिकित्सालय अब बोल नहीं सकता, क्योंकि इसका मुंह (मुख्य दरवाज़ा) गिर चुका है। छतें ऐसे टेढ़ी हैं जैसे सालों से इलाज की आस लगाए किसी गाय की रीढ़। इधर बीमार पशु रोज़ दुआ करते हैं “हे गोपाल, कोई तो डॉक्टर भेज दे, उधर नेता लोग मंचों से गर्जना करते हैं हम हैं गौसेवक! जनता के सच्चे सेवक!
सेवा का आलम ये है कि सेवा भवन ही खंडहर हो गया और सेवा करने वाला ढूंढे नहीं मिलता। भंडरा में आज हाल ये है कि पशु बीमार हैं, भवन बीमार है, और प्रणालियाँ तो आईसीयू में हैं। फिर भी कागज़ों में सब “स्वस्थ” है। डॉक्टर तैनात, कर्मचारी मौजूद और पशु खुशहाल!
लगता है सरकारी फाइलों में सबका इलाज हो चुका है बस ज़मीन पर ही बीमारी बाकी रह गई है। जनता पूछती है नेता जी जब आप खुद को गौसेवक बताते हैं, तो जरा इस गौशाला जैसे हॉस्पिटल की हालत देखिए। लेकिन नेता जी मुस्कुराकर जवाब देते हैं। भवन जर्जर नहीं है, विकास के संक्रमण काल में है। वाह भंडरा! जहां गाय रोती है, भवन ढहता है पर भाषणों में “सेवा” का स्तर बढ़ता ही जाता है।
