जौनपुर। बसन्त पंचमी के अवसर पर जिले में अनेक स्थानों पर होलिका की स्थापना विधि विधान से की गयी। विद्वान ब्राह्मणों की उपस्थिति में मंत्रोच्चार के साथ रेड का पेड़ लगाकर होलिका बनाई गयी।
पौराणिक कथाओं के अनुसार हिरण्यकश्यप एक राक्षस राजा था जिसे अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था. उसने ईश्वर के बजाय खुद को पूजने का आदेश दिया, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था, जिससे हिरण्यकश्यप बहुत क्रोधित हुआ। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्निदेव से यह वरदान मिला था कि वह आग में नहीं जलेगी।
इसी वरदान का लाभ उठाने के लिए हिरण्यकश्यप ने होलिका को प्रह्लाद को लेकर चिता में बैठने का आदेश दिया।
अग्नि प्रवेश और चमत्कार- होलिका, प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर आग में बैठ गई. प्रह्लाद ने भगवान विष्णु का नाम जपना शुरू किया. ईश्वर की कृपा से आग की लपटों में होलिका जलकर भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद सुरक्षित बच गए।
इस घटना के बाद से, बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक के रूप में फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन मनाया जाने लगा। यह पौराणिक कथा बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय का प्रतीक है।
रंगों की उमंग से भरी होली, इस आध्यात्मिक विजय का एक सशक्त प्रतीक है। यह लोगों को प्रेम, खुशी और सामुदायिक सद्भाव अपनाने के लिए प्रेरित करती है। पूरे भारत में, समुदाय उत्सव मनाने के लिए एकत्रित होते हैं, एक-दूसरे पर रंग-बिरंगे रंग डालते हैं, स्वादिष्ट मिठाइयाँ बाँटते हैं और सामूहिक उल्लास में डूब जाते हैं।
