प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज से जुड़ी एक अपील पर सुनवाई करते हुए अपने फैसले में गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पश्चिमी विचारों और लिव-इन (साथ रहने) की अवधारणा के प्रभाव में शादी किए बिना साथ रहने वाले युवाओं की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। ऐसे रिश्ते फेल होने पर अक्सर एफआईआर दर्ज कर दी जाती है और कानून महिलाओं के पक्ष में होने के कारण पुरुषों को उन धाराओं के तहत दोषी ठहराया जाता है, जो उस समय बनाए गए थे जब लिव-इन का कॉन्सेप्ट मौजूद नहीं था।
हाईकोर्ट ने इस तर्क के आधार पर अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट से मिली उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया। यह आदेश जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत मिश्रा की बेंच ने दिया है।
यह पूरा मामला वर्ष 2021 का है। मार्च 2024 में महाराजगंज की पाक्सो कोर्ट ने इस पर फैसला सुनाया था। कोर्ट ने चंद्रेश को आईपीसी, पाक्सो और एससी/एसटी एक्ट के तहत दोषी ठहराते हुए अलग-अलग मामलों में 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा सुनाई थी। अप्रैल 2024 में चंद्रेश ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी थी।
आरोप था कि चंद्रेश ने शादी का झांसा देकर एक नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर बेंगलुरु ले गया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। नाबालिग लड़की 6 अगस्त 2021 को अपने घर लौट आई और उसने बताया कि चंद्रेश ने उसे शादी करने का वादा किया था, लेकिन बाद में शादी नहीं की। लड़की के पिता ने दावा किया कि उनकी बेटी नाबालिग है और उसके आधार कार्ड के अनुसार जन्मतिथि 1 मार्च 2003 है।
क्या है पूरा मामला:-
आरोप था कि चंद्रेश शादी का झांसा देकर एक नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर बेंगलुरु ले गया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। नाबालिग लड़की 6 अगस्त 2021 को अपने घर लौट आई। उसने बताया कि चंद्रेश ने उसे शादी करने के इरादे से बहलाया था लेकिन उससे शादी नहीं की। लड़की के पिता का आरोप था कि उनकी बेटी नाबालिग है और आधार कार्ड के अनुसार उसकी जन्मतिथि 1 मार्च 2003 थी।
पुलिस ने केस दर्ज कर आरोपी चंद्रेश के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी. ट्रायल के दौरान 8 गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे. चंद्रेश ने दावा किया कि उसके खिलाफ एफआईआर गलत तरीके से दर्ज की गई थी. चंद्रेश ने हाईकोर्ट में दलील दी कि दोनों पक्षों के बीच पुरानी दुश्मनी के कारण झूठे सबूतों के आधार पर चार्जशीट जमा की गई है. उसने मेडिकल सबूतों से इनकार किया और इस मामले में झूठे आरोप लगाने की बात कही. एक गवाह के बयान के अनुसार 17 अगस्त 2021 को पीड़िता प्रेग्नेंट पाई गई थी और उसे पेट दर्द और ब्लीडिंग की शिकायत थी. वहीं गवाही देने वाले डॉ. सुनील कुमार पासवान ने साबित किया कि ऑसिफिकेशन टेस्ट के समय पीड़िता की उम्र लगभग 20 साल थी.
हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों और ट्रायल कोर्ट के फैसले को देखने के बाद हमारा मानना है कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता के खिलाफ फैसला और सज़ा का आदेश देते समय रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर ठीक से विचार नहीं किया है. जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) रूल्स, 2007 के नियम-12 के अनुसार पीड़िता ने पहले जिस स्कूल में पढ़ाई की थी वहां से सर्टिफिकेट ज़रूरी था. यहां तक कि जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 की धारा-94(2) के अनुसार भी स्कूल से सर्टिफिकेट या मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट ज़रूरी था. इस मामले में पीड़िता मैट्रिकुलेशन परीक्षा में शामिल नहीं हुआ थी।
