सुल्तानपुर। इस समय सब्जी की फसल की मुख्य फसल आलू की फसल है सब्जी में यह एक ऐसी सब्जी है जो पूरे साल खाई और खिलाई जाती है यदि आलू का भाव बाजार में बड़ा तो और सारी सब्जियों का भी भाव बढ़ जाता है। किसान भाइयों की आलू की फसल में लगाई गई पूंजी यदि जल्द खाली करना चाहे तो सिर्फ दो-तीन माह में भी खाली हो जाती है और यदि फसल में कोई रोग या आपदा आ जाए तो नुकसान भारी नुकसान भी हो जाता है आलू की फसल में झुलसा रोग लग गई तो फसलों में यदि समय पर उपचार न किया गया तो भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है।
इसी संबंध में कृषि विज्ञान केंद्र बरासिन के हिमांशु सिंह से की गई एक बातचीत में उन्होंने बताया कि आलू की खेती भारतीय किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी रही है, लेकिन यह फसल भी विभिन्न रोगों और कीटों से न बचाया गया तो फसल प्रभावित होती है। इनमें से एक प्रमुख और खतरनाक रोग है पछेती झुलसा रोग, जो आलू की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।
पछेती झुलसा रोग एक फंगल संक्रमण है जो आलू की फसल में मुख्य रूप से पाई जाती है। यह रोग Phytophthora infestans नामक फंगस के कारण होता है, जो आलू के पत्तों, तनों, और कंदों पर हमला करता है। जब यह रोग फैलता है, तो यह फसल की वृद्धि में रुकावट डालता है और उत्पादन में भारी कमी कर देता है। पछेती झुलसा रोग आलू के पौधों में पत्तियों के मुड़ने, काले पड़ने और तनों में सड़न की समस्या पैदा करता है आलू की फसल में पछेती झुलसा रोग के लक्षण पहचानना बहुत महत्वपूर्ण है, ताकि समय रहते इसका इलाज किया जा सके। इसके प्रमुख लक्षण पत्तियों पर काले धब्बे: सबसे पहले पत्तियों पर काले या भुरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो धीरे-धीरे बढ़कर पत्तियों को मुरझा देते हैं।
पौधे का मुरझाना: जब यह रोग बहुत फैल जाता है, तो पूरा पौधा मुरझाने लगता है, जिससे फसल का उत्पादन कम हो जाता है।
रोग के चलते आलू के कंदों पर भी सड़न पैदा कर सकता है, जिससे उनका आकार घटता है और उनकी गुणवत्ता खराब हो जाती है।
पानी की अधिकता: यह रोग अधिक नमी वाले वातावरण में तेजी से फैलता है, जिससे आलू के पौधे पूरी तरह से संक्रमित हो सकते हैं। हिमांशु ने बताया कि सुरक्षात्मक एक-दो छिड़काव मैंगोजेब एम 45 का अवश्य करा देना चाहिए जिस रोग आने की संभावना कम हो जाती है यदि रोग आ गया है तो खड़ी फसल में रोग के लक्षण दिखाई देने पर साइमोक्सानिल 8प्रतिशत +मैंकोजेब 64 प्रतिशत (डब्लू पी) 600 ग्राम या कॉपरड्राई ऑक्साइड 77 प्रतिशत (डब्लू पी) 400 ग्राम प्रति एकड़ की दर से घोल बनाकर 10 से 15 दिनों में दिनों के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव करना चाहिए। जिससे रोग नियंत्रित हो सकता है मौसम में नमी या अधिक ठंड या इस समय बारिश हो जाने पर इस रोग का प्रभाव बढ़ जाता है जिससे किसान भाइयों को अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।
