प्राचीन भारतीय ज्ञान-संपदा को आधुनिक जीवन से जोड़ने की जरूरत पर जोर
लखनऊ। स्थित बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में 27 नवंबर को एमीनेंट लेक्चर सीरीज समिति और रिसर्च एवं डेवलपमेंट सेल के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और वर्तमान संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता’ विषय पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान आयोजित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने की, जबकि मुख्य अतिथि और वक्ता के रूप में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) नई दिल्ली के निदेशक (अनुसंधान एवं प्रशासन) डॉ. ओम जी उपाध्याय उपस्थित रहे। मंच पर डीन अकेडमिक अफेयर्स प्रो. एस. विक्टर बाबू, समिति की चेयरपर्सन प्रो. शिल्पी वर्मा तथा रिसर्च एवं डेवलपमेंट सेल के डायरेक्टर प्रो. शिशिर कुमार भी मौजूद रहे।कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और बाबासाहेब के चित्र पर पुष्पांजलि के साथ हुई।
कुलगीत के उपरांत अतिथियों का पौधा एवं स्मृति चिन्ह देकर स्वागत किया गया। प्रो. शिल्पी वर्मा ने सभी का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की, जबकि मंच संचालन डॉ. शिखा तिवारी ने किया।
कुलपति प्रो. मित्तल ने अपने संबोधन में कहा कि भारत एक समय विश्व का ज्ञान केंद्र था और वैश्विक जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान देता था। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता की वैज्ञानिक सोच, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक समृद्धि ने सदियों तक विश्व को दिशा दी। आज जब समाज नैतिक मूल्यों की कमी, तनाव और असंतुलन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तो भारतीय दर्शन, योग, ध्यान, आयुर्वेद और हमारे शास्त्रों में निहित जीवन-दृष्टि इन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती है।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारतीय ज्ञान परंपरा को इतिहास तक सीमित रखने के बजाय आधुनिक जीवन में सार्थक रूप से अपनाया जाना चाहिए।
मुख्य वक्ता डॉ. ओम जी उपाध्याय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा दुनिया की सबसे प्राचीन और सतत प्रवाहमान संस्कृतियों में से एक है, जिसने हजारों वर्षों से मानवता को दिशा प्रदान की है। उन्होंने कहा कि संस्कृत अधिकांश भाषाओं की मूल धुरी है और भारतीय भाषाओं की समृद्धि हमारी सांस्कृतिक पहचान का आधार है।
उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पहला सरकारी दस्तावेज है जिसने भारत को ‘विश्वगुरु’ की अवधारणा के साथ जोड़ा है।
डॉ. उपाध्याय ने जल प्रबंधन, धातु विज्ञान, स्थापत्य कला, आयुर्वेद, योग, गणित और खगोल विज्ञान जैसे क्षेत्रों में प्राचीन भारत की उन्नत उपलब्धियों का उदाहरण देते हुए बताया कि यह ज्ञान आज भी विश्व को चकित करता है। उन्होंने ऋषि-मनीषियों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर ही भारत आत्मनिर्भर और सशक्त बन सकता है।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों और शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर कुलपति और मुख्य वक्ता ने विस्तार से दिया। उनके विचारों ने प्रतिभागियों को भारतीय ज्ञान परंपरा के गहन अध्ययन एवं शोध की ओर प्रेरित किया।
अंत में प्रो. शिशिर कुमार ने धन्यवाद ज्ञापित किया।कार्यक्रम में विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
