रिपोर्ट: अजमत अली।
कुदरहा। रजा मस्जिद जिभियांव के इमाम व मदरसा अरबिया कादरिया रिजविया वझहुल उलूम जिभियाँव के प्रिंसिपल मौलाना मेराज अहमद ने मुक़द्दस माहे रमजान की फजीलत को बताया। कहा कि यूं तो रमजान का पूरा महीना मोमिनों के लिए खुदा की तरफ से रहमत, बरकत और मगफिरत से लबरेज है लेकिन अल्लाह ने इस मुबारक महीना को तीन अशरो में तकसीम किया है। पहला अशरा खुदा की रहमत वाला होता है पहले अशरे में 10 दिनों तक अल्लाह की रहमत से सभी सराबोर होते रहेंगे। 1 से 10 रमजान यानि पहले अशरे में खुदा की रहमत नाजिल होती है। पहले अशरे का तीन रोजा बीत चुका है। 10वीं रमजान से दूसरा अशरा शुरू हो जाता है। रमजान का पहला अशरा बेशुमार रहमत वाला होता है।
पूरे रमजान महीने को तीन अशरो में बांटा गया है रमजान के पहले 10 दिनों को पहला अशरा, दूसरे 10 दिनों को दूसरा और आखिरी 10 दिनों को तीसरा अशरा कहा जाता है। उन्होंने कहा कि पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक हदीस है जिसका मफूम है कि रमजान का पहला अशरा रहमत वाला है दूसरा अशरा अपने गुनाहों की माफी मांगने का है और तीसरा अशरा जहन्नम की आग से अल्लाह की पनाह चाहने वाला है।
रमजान के पहले अशरे में अल्लाह की रहमत के लिए ज्यादा से ज्यादा इबादत की जानी चाहिए। इसी तरह रमजान के दूसरे अशरे में अल्लाह से अपने गुनाहों की रो-रो कर माफी मांगनी चाहिए। रमजान का तीसरा अशरा जहन्नम की आग से अल्लाह की पनाह मांगने का है।
वक्त की पाबंदी का अभ्यास कराता है रमजान
मौलाना मेराज अहमद कहते हैं कि रमजान का हर पल महत्व रखता है। रमजान वक्त की पाबंदी का अभ्यास कराता है। रमजान में समय पर नमाज अदा करना, समय पर तिलावत करना, समय पर इफ्तार करना, समय पर सहर करना, समय पर सोने व समय पर जागना यह सब इबादत है। रोजा ही एक ऐसी इबादत है जिसमें सीधा अल्लाह ताला से इंसान का संपर्क होता है क्योंकि अगर कोई नमाज पढ़ रहा है तो दूसरा आदमी देख रहा है। रोजा की नमाज में अल्लाह और रोजेदार के अलावा तीसरा कोई नहीं जानता कि अल्लाह से क्या वार्ता हुई है। उन्होंने कहा कि रमजान में नहीं बल्कि हमेशा कुरान शरीफ की खूब तिलावत करनी चाहिए। नफिल नमाज पढ़नी चाहिए। सारी बुराइयों से दूर रहना चाहिए। यह महीना ऐसा है जो आदमी को आदमी से मिलाते हुए 11 महीनों तक लगातार नेक काम करने व बुराई से बचने का अभ्यास कराता है।
रोजा रहने से बदल जाती है दिनचर्या
रमजान के महीने में वक्त की पाबंदी खुदा का नायाब तोहफा है। रमजान उल मुबारक में मुसलमान की दिनचर्या ही बदल जाती है। वैसे तो रोजाना पांच वक्त का नमाज पढ़ना हर मोमिन के लिए फर्ज है लेकिन इस महीने की फजीलत ही अलग है। इस महीने में मुसलमान रोजा रख रहे हैं और पांच वक्त की नमाज के अलावा तराबीह की नमाज भी अदा करते हैं। रोजा पूरे एक माह हमे अभ्यास कराता है कि साल के शेष 11 माह हमें किस प्रकार गुजारनी चाहिए।
