•इस्कॉन की स्थापना कर 14 बार विश्व भ्रमण, सैकड़ों मंदिरों के माध्यम से विदेशों तक पहुंचाई भारतीय संस्कृति
धर्म/आस्था: एक ऐसे संत, जिन्होंने “हरे कृष्ण” महा-मंत्र के माध्यम से पूरी दुनिया को सनातन धर्म से जोड़ा ए. सी. भक्ति वेदांत स्वामी प्रभुपाद, जिन्हें श्रील प्रभुपाद के नाम से जाना जाता है। गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के इस महान संत का नाम विश्व स्तर पर सनातन धर्म की पताका स्थापित करने के लिए सम्मानपूर्वक लिया जाता है।
श्रील प्रभुपाद का जन्म सितंबर 1896 में कोलकाता में अभय चरण डे के रूप में हुआ। उन्होंने वर्ष 1959 में संन्यास ग्रहण किया और वृंदावन में निवास करते हुए श्रीमद्भागवत पुराण का अंग्रेजी भाषा में कई खंडों में अनुवाद किया।
वर्ष 1966 में उन्होंने न्यूयॉर्क में इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्ण कॉन्शियसनेस (इस्कॉन) की स्थापना की। इसके बाद 1966 से 1977 के बीच उन्होंने 14 बार विश्व भ्रमण कर हरे कृष्ण आंदोलन को वैश्विक पहचान दिलाई। उनके प्रयासों से दुनिया भर में लगभग 800 इस्कॉन मंदिर स्थापित हुए, जिनमें न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को, लंदन, पेरिस और ऑस्ट्रेलिया प्रमुख हैं।
श्रील प्रभुपाद के हरे कृष्ण अभियान ने विशेष रूप से विदेशियों को सनातन संस्कृति और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ा। उनके कदम जहां-जहां पड़े, वहां “हरे राम-हरे कृष्ण” मंत्र की गूंज सुनाई देने लगी।
इस संबंध में इस्कॉन के वर्तमान आचार्य जयपताका स्वामी के शिष्य सुरपति दास ने बताया कि श्रील प्रभुपाद ने सबसे पहला इस्कॉन मंदिर न्यूयॉर्क में स्थापित किया, जिसके बाद विश्वभर में मंदिरों की लंबी श्रृंखला विकसित हुई। श्रील प्रभुपाद का जीवन और कार्य आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है।
