हिंदी कथा साहित्य के वरिष्ठ और विख्यात कथाकार, नामचीन साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन का 7 जनवरी को रात 10:30 बजे मध्यप्रदेश के जबलपुर में निधन हो गया। वे 90 वर्ष के थे। मंगलवार सुबह ही उन्हें अस्वस्थता के चलते इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां देर रात उन्होंने अंतिम सांस ली।
ज्ञानरंजन को हिंदी कथा साहित्य के सातवें दशक के यशस्वी कथाकारों में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। उन्होंने हिंदी कहानी को एक नया गद्य, नई दृष्टि और नई संवेदनशीलता दी। ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’, ‘अमरूद’ और ‘पिता’ जैसी उनकी कहानियाँ हिंदी कथा साहित्य की कालजयी रचनाओं में शुमार की जाती हैं।
उनकी कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन के अंतर्विरोधों, सामाजिक विडंबनाओं और समकालीन जीवन की विरूपताओं को अत्यंत सशक्त भाषिक कौशल के साथ अभिव्यक्त करती हैं। ज्ञानरंजन ने कथा लेखन के माध्यम से न केवल विषयगत विस्तार किया, बल्कि भाषा और शिल्प को भी नई ऊँचाई प्रदान की। उनके लेखन ने आने वाली पीढ़ियों के कथाकारों को गहराई से प्रभावित किया।
ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवंबर 1936 को महाराष्ट्र के अकोला में हुआ था। उनका बचपन और किशोरावस्था अजमेर, दिल्ली और बनारस में बीती। प्रयागराज में उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और यही शहर उनके व्यक्तित्व व साहित्यिक संस्कारों का केंद्र रहा। लंबे समय से उनका स्थायी निवास मध्यप्रदेश के जबलपुर में था, हालांकि उनका प्रिय शहर हमेशा प्रयागराज ही रहा।
ज्ञानरंजन के निधन से हिंदी साहित्य जगत ने एक ऐसा रचनाकार खो दिया है, जिसने कहानी को केवल कला नहीं, बल्कि समाज का सघन दस्तावेज बना दिया। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है और उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है।
