लखनऊ। उत्तर प्रदेश में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव समय पर न हो पाने की आशंका गहराने लगी है। इसकी सबसे बड़ी वजह समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का अब तक गठन न होना बताया जा रहा है। आयोग के अभाव में पंचायतों में आरक्षण की प्रक्रिया तय नहीं हो पा रही, जिससे चुनाव कार्यक्रम प्रभावित हो सकता है।
हालांकि, पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने एक बार फिर दावा किया है कि प्रदेश में पंचायत चुनाव निर्धारित समय अप्रैल–मई में ही कराए जाएंगे।
पंचायतीराज विभाग की ओर से छह सदस्यीय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है, लेकिन अभी तक इस पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका है। जब तक आयोग गठित होकर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं करता, तब तक ओबीसी आरक्षण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना संभव नहीं है।
जनगणना 2011 के अनुसार, प्रदेश में
अनुसूचित जाति (SC) : 20.6982 प्रतिशत
अनुसूचित जनजाति (ST) : 0.5677 प्रतिशत
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में इन वर्गों के लिए सीटें इसी अनुपात में आरक्षित की जाती हैं।
वहीं, ओबीसी जातियों का प्रतिशत जनगणना 2011 में शामिल नहीं था। वर्ष 2015 में कराए गए रैपिड सर्वे के अनुसार, प्रदेश की ग्रामीण आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी 53.33 प्रतिशत बताई गई थी। इसी आधार पर 2021 के पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय किया गया था।
नियमों के अनुसार किसी भी ब्लॉक में भले ही ओबीसी आबादी 27 प्रतिशत से अधिक हो, लेकिन ग्राम प्रधान के पद 27 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षित नहीं किए जा सकते। यदि ओबीसी आबादी 27 प्रतिशत से कम हो, तो उसी अनुपात में आरक्षण लागू होता है। प्रदेश स्तर पर पंचायत चुनाव में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य है।
गौरतलब है कि नगर निकाय चुनाव के दौरान भी ओबीसी आंकड़ों को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था। इसके बाद सरकार ने नगर निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कर सर्वे और रिपोर्ट तैयार करवाई थी। अब पंचायत चुनाव में भी इसी तर्ज पर राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग जिलों में जाकर ओबीसी आबादी का सर्वे करेगा।
आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही आरक्षण की अंतिम प्रक्रिया पूरी की जाएगी। ऐसे में यदि आयोग के गठन और सर्वे में देरी होती है, तो प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव टलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
