•प्रयागराज पुस्तक मेले का दसवें दिन “भारतीय प्रशासन और पुलिस (प्राचीन काल से आधुनिक काल तक)” तथा “कुछ यादें, कुछ बातें भी – माई डेज विद पुलिस” और “आलोचना के दायरे” का हुआ विमोचन।
प्रयागराज। ग्यारह दिवसीय प्रयागराज पुस्तक मेला अब अपने समापन की ओर बढ़ चला है। शनिवार को मेले का दसवां दिन रहा, जबकि रविवार को इसका समापन होगा। दसवें दिन भी पुस्तक प्रेमियों का उत्साह देखते ही बना। बड़ी संख्या में पाठक मेले में पहुंचे और पुस्तकों के प्रति उनका गहरा लगाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
कटरा स्थित द पाम्स रिसोर्ट – रॉयल गार्डन (लक्ष्मी टॉकीज के सामने) में आयोजित इस पुस्तक मेले में हिंदी पुस्तकों की जमकर बिक्री हुई। मुंशी प्रेमचंद, मंटो और रवीन्द्रनाथ टैगोर सहित अनेक साहित्यकारों की कहानियों के चित्रकथा संस्करण बच्चों को विशेष रूप से आकर्षित कर रहे हैं। मेले में उमड़ी भीड़ के बीच यह तथ्य उभरकर सामने आया कि प्रयागराज (इलाहाबाद) और उससे जुड़े विषयों पर आधारित पुस्तकों का आकर्षण आज भी बना हुआ है।
आयोजक मनोज सिंह चंदेल एवं सह-आयोजक मनीष गर्ग ने संयुक्त रूप से बताया कि फोर्स वन बुक्स द्वारा बुकवाला के सहयोग से शनिवार को प्रयागराज पुस्तक मेले में डॉ. पन्ना लाल तथा डॉ. अजय कुमार द्वारा लिखित पुस्तकों “भारतीय प्रशासन और पुलिस (प्राचीन काल से आधुनिक काल तक)” और “कुछ यादें, कुछ बातें भी – माई डेज विद पुलिस” का विमोचन किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ राजनेता एवं पूर्व सांसद कुंवर रेवती रमण सिंह रहे, जबकि उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक एस. एन. चक विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अतिथियों ने लेखकों को बधाई देते हुए कहा कि प्रशासन और पुलिस के अनुभवों पर आधारित ऐसी पुस्तकें समाज को सही दृष्टि और ऐतिहासिक समझ प्रदान करती हैं।
एक अन्य समारोह में पुस्तक “कॉम्पिटेटिव एक्जाम एस का चक्रव्यूह कैसे तोड़े” का भी विमोचन किया गया। पुस्तक के लेखक अनूप कुमार गुप्ता (आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र, वर्तमान में ओएनजीसी में कार्यरत) हैं।
इसी क्रम में प्रयागराज पुस्तक मेले में साहित्य भंडार द्वारा आयोजित पुस्तक लोकार्पण सह परिचर्चा कार्यक्रम में कवि एवं आलोचक प्रो. प्रभाकर सिंह की आलोचनात्मक पुस्तक “आलोचना के दायरे” के द्वितीय संस्करण का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ प्रो. सन्तोष भदौरिया ने की।
आमंत्रित वक्ता डॉ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता ने पुस्तक का परिचय देते हुए बताया कि यह कृति तीन खंडों— ‘कवि और कविताई’, ‘कथा और कथेतर’ तथा ‘आलोचना और विचार’ में विभाजित है और समकालीन आलोचनात्मक विमर्श को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की डॉ. अमृता ने कहा कि प्रो. प्रभाकर सिंह अपनी कविता और आलोचना के माध्यम से भारतीय भाषाओं के लोकपक्ष और नारीवादी सौंदर्यशास्त्र को प्रमुखता देते हैं।
अपने वक्तव्य में प्रो. प्रभाकर सिंह ने कहा कि इस पुस्तक में इतिहास-बोध के सहारे आलोचनात्मक लेखों का संकलन किया गया है। अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. सन्तोष भदौरिया ने पुस्तक को छात्रों और शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अमरजीत राम ने किया। इस अवसर पर डॉ. शांति चौधरी, डॉ. मोतीलाल, डॉ. अनिल सिंह, वर्षा अग्रवाल सहित इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अनेक प्राध्यापक, विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।
