•शुद्ध हृदय से उपासना करने से पूर्ण होती है मनोकामना।
मुरादाबाद। जनपद की ठाकुरद्वारा तहसील के ग्राम बहेड़ी ब्रह्मनान में प्राचीन वास्तुकला और आध्यात्मिक विरासत का प्रदर्शक जलरोधक चुनियां ईंट से निर्मित सैकड़ो वर्ष प्राचीन शिवालय में विराजमान शिवलिंग लोगों की आस्था एवं विश्वास का केंद्र है।

ऐसी मान्यता है कि शुद्ध हृदय एवं भक्तिभाव से यहाँ उपासना करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, मन को शांति मिलती है, नकारात्मकता घटती है, मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है और भक्तों की मनोकामना पूर्ण होती है, जिससे जीवन में सकारात्मकता, सुख और समृद्धि आती है।
मन्दिर के पवित्र वातावरण, मंत्रोच्चार और घंटियों की ध्वनि से मन शांत होता है और आत्मबल बढता है । भगवान विष्णु के वाहन गरूड का स्वरूप घंटी ॐ ध्वनि का प्रतीक है जो कि देवताओं का आवाह्न करने के लिए बजाई जाती है वास्तव में यह ध्वनि ब्रह्मांड की उत्पत्ति का मूल कंपन और आध्यात्मिक जागृति लाता है।
शिक्षाविद पं.राधेश्याम शर्मा ने बताया कि यद्यपि इस मन्दिर में विराजमान शिवलिंग के स्वयंभू अथवा स्थापित होने की स्पष्ट जानकारी नहीं है।
भक्तों के अनुसार चमत्कारिक रूप से शिवलिंग का निरन्तर रंग बदलता रहता है। शिवालय में तीन बार ताली बजाना भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। यह भूलोक, पाताल एवं स्वर्गलोक तीनों लोकों और त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को नमन करने का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव देवाधिदेव महादेव हैं। महाशिवरात्रि का पवित्र पर्व भक्तों के लिए विशेष है।
बड़ी तादाद में इस अवसर पर हरिद्वार आदि स्थलों से कांवड के माध्यम से पतित पावनी गंगा का जल लाकर ब्रह्ममुहूर्त में रूद्राभिषेक करते है। और अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र के कल्याण के लिए मंगल कामना करते हैं ।
सनातन धार्मिक मान्यता के अनुसार पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय का अन्तर्मन से जाप करते हुए उत्तर दिशा की ओर मुंह करके शिवलिंग पर पवित्र जल अथवा गंगा जल अर्पित करने के बाद दही, शहद, शक्कर आदि अर्पित करना चाहिए तथा पुनः शुद्ध जल अर्पित कर बेर, बेलपत्र, सफेद पुष्प, भांग धतूरा आदि अर्पित किया जाता है। खड़े रहकर जल अर्पित करते समय दोंनो पैर बराबर नहीं रखना चाहिए। दांया पैर आगे और बांया पैर थोड़ा पीछे रखना चाहिए।
ताँबे का पात्र से जल अर्पित करना उपयुक्त माना जाता है किन्तु इस पात्र से दूध नहीं चढाना चाहिए। जल अर्पित करने के लिए स्टील के पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। तथापि देवाधिदेव भगवान शिव बहुत भोले हैं श्रद्धाभाव से भक्तजन के समर्पण भाव से बिना किसी प्राविधान एवं नियम के रीझ जाते हैं।
