लखनऊ। प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय ने विधानसभा में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देते हुए स्पष्ट किया कि राज्य की प्रत्येक शैक्षणिक संस्था निर्धारित संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के आधार पर संचालित होती है। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय और विश्वविद्यालय अलग-अलग नियमों से नियंत्रित होते हैं, इसलिए उनके कर्मचारियों और शिक्षकों की सुविधाओं की सीधी तुलना करना उचित नहीं है।
मंत्री ने बताया कि राजकीय महाविद्यालयों के शिक्षक राज्य सरकारी सेवक होते हैं, जिनकी नियुक्ति और सेवा शर्तें संविधान के अनुच्छेद 309 के अंतर्गत अधिसूचित नियमों से विनियमित होती हैं। वहीं राज्य विश्वविद्यालय और उनसे संबद्ध महाविद्यालयों के कर्मचारी उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 तथा संबंधित परिनियमों के अधीन कार्य करते हैं, जिससे दोनों की सेवा शर्तों में स्वाभाविक अंतर रहता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष निर्धारित है, जबकि राजकीय महाविद्यालयों में यह 60 वर्ष है। विश्वविद्यालय शिक्षकों को अर्जित अवकाश, विशेष आकस्मिक अवकाश तथा यूजीसी मानकों के अनुरूप अन्य अवकाश सुविधाएं प्राप्त होती हैं, जबकि महाविद्यालय शिक्षकों के लिए अलग प्रकार की अवकाश व्यवस्था लागू है, जिसमें चिकित्सकीय अवकाश सहित विभिन्न प्रावधान शामिल हैं।
मंत्री ने कहा कि यूजीसी नियमावली के तहत विश्वविद्यालय शिक्षकों को अर्धवेतन अवकाश और संचयी अवकाश जैसी सुविधाएं मिलती हैं, जबकि महाविद्यालयीन शिक्षकों के लिए सेवा अवधि में चिकित्सकीय प्रमाणपत्र के आधार पर दीर्घकालिक अवकाश की व्यवस्था है। इस प्रकार दोनों व्यवस्थाओं में अलग-अलग प्रकार के लाभ निर्धारित हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी एक वर्ग को मिलने वाली सुविधा को दूसरे वर्ग पर समान रूप से लागू करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि दोनों की सेवा शर्तें और नियामक ढांचा अलग है। तुलनात्मक दृष्टिकोण के बजाय नियमों के अनुरूप व्यवस्था बनाए रखना ही न्यायसंगत है। सरकार शिक्षा व्यवस्था को संतुलित और नियमसम्मत ढंग से संचालित करने के लिए प्रतिबद्ध है तथा सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लिए जा रहे हैं।
